मैं कौन हूँ?

शायद वही, जिसे आप जानते हैं… पर मानते नहीं।

‘मैं कौन हूँ?’

कितना अजीब सवाल है ना ये? पहली नज़र में तो मज़ाक ही लगता है।

नहीं तो ये कैसे हो सकता है कि हमें ये भी न पता हो कि हम हैं कौन?

हम पूरी ज़िंदगी अपने लिए ही तो जीते हैं। हमारे हर ख़याल के पीछे, हर डर, हर योजना के पीछे बस यही तो छुपा होता है:-
इस ‘मैं’ को बचाना, और इसे सही साबित करना।

इसलिए दिमाग़ कहता है, मुझे ये तो पता ही है की मैं कौन हूँ। इसमें सोचने जैसा क्या है?

ये इतना स्वाभाविक लगता है कि हमने कभी इस पर रुककर ध्यान ही नहीं दिया

ठीक वैसे ही जैसे हमें साँस लेने और छोड़ने के बारे में कभी नहीं सोचना पड़ता, वो अपने आप चलता रहता है।

इसलिए अगर जानना हो कि ये ‘मैं’ कौन है, तो हमसे बेहतर साधन और कौन हो सकता है?

हमें बस वो देखना है, जो हम पहले से जानते हैं, पर कभी गौर नहीं किया।

यह कोई परम सत्य नहीं?

पहले एक बात साफ़ कर लें। यहाँ हमारा मक़सद किसी परम सत्य तक पहुँचना नहीं है। हम यह नहीं देख रहे कि सच में ‘मैं’ कौन हूँ, हम सिर्फ़ यह देख रहे हैं कि हम अपने आप को क्या मानते हैं।

हो सकता है, किसी दार्शनिक, किसी धर्मगुरु, या किसी किताब के मुताबिक़ यह बिल्कुल ग़लत हो पर इससे फ़र्क़ क्या पड़ता है?

हम यह दावा तो कर ही नहीं रहे कि “यही आख़िरी सच है।”
हम तो बस इतना देख रहे हैं कि हम, अपने मन में, ‘मैं’ किसे कहते हैं।

सोचिए…
क्या हो अगर आप अपनी जाँच कराने के बजाय, डॉक्टर से ‘सही’ रिपोर्ट के सारे नंबर पूछकर, खुद ही अपनी मेडिकल रिपोर्ट बना लें तो?

यही तो होता है जब हम अपनी सच्चाई छोड़कर किसी धर्मगुरु की बात को आँख मूँदकर अपना लेते हैं।

यह लेख उसी से बचने की कोशिश है। यह हमारी अपनी रिपोर्ट है।

और हाँ, हो सकता है इसमें नतीजे वैसा न निकलें जैसे हम चाहते हैं। पर रिपोर्ट का काम क्या है?
जो है, वही दिखाना।

और ज़रा सोचिए…
क्या आपका अपना मन भी ये देखने को नहीं करता की कौन है वो जिसके लिये आप इतनी भाग दौड़ कर रहे हैं?

किसके लिए हम दिन-रात चिंता में घुले जा रहे हैं? किसे बचाने, किसे सजाने, किसे साबित करने में हमने पूरी ज़िंदगी झोंक दी है?

तो चलिए…
एक बार खुद को कठघरे में खड़ा करते हैं और सीधा सवाल करते हैं अपने आप से:- 

आख़िर कौन है ये ‘मैं’?

क्या मैं शरीर हूँ?

शक की सुई सबसे पहले यहीं टिकती है।और वाजिब भी है। हमारा लगभग पूरा वक़्त तो इसी शरीर की सेवा में बीतता है।

लेकिन सोचिए…
क्या हम सच में मानते हैं कि हम ही शरीर हैं?

अपनी सच्चाई को देखने का एक आसान तरीका है, अपनी भाषा पर ध्यान देना।

हम दिन में न जाने कितनी बार “मैं” कहते हैं। तो जब हम “मैं” कहते हैं, क्या हम अपने हाथ, पैर, पेट की बात कर रहे होते हैं?

नहीं। हम कभी नहीं कहते — “मैं हाथ हूँ”। हम हमेशा कहते हैं — “ये मेरा हाथ है”

मतलब साफ़ है: “मैं” और “हाथ” अलग हैं।
“मैं” मालिक है, और “हाथ” उसकी संपत्ति।

यही बात पूरे शरीर पर लागू होती है। हम कहते हैं “मेरा शरीर”, “मैं शरीर” नहीं।

और ये बात अनुभव में भी दिखती है। अगर हमारा वज़न 10% कम हो जाए, क्या हम कहेंगे — 
“मैं 90% ही रह गया”?

नहीं।

कोई अंग कट जाए, तो भी “मैं” उतना ही पूरा रहता है।

हाँ, ये सही है कि “मैं” के लिए शरीर ज़रूरी है। अगर शरीर नहीं होगा, तो “मैं” बोलने वाला भी कोई नहीं होगा।

पर क्या इसका मतलब ये है कि शरीर ही “मैं” है?

नहीं।

ठीक वैसे ही जैसे फूल की खुशबू के लिए फूल ज़रूरी है, लेकिन फूल = खुशबू नहीं।

उसी तरह,
“मैं” उठता तो शरीर से है, लेकिन स्वयं शरीर नहीं है।

तो फिर सवाल वहीं का वहीं है, कौन है ये ‘मैं’ जो इस शरीर का मालिक है, और जो शरीर के कम होने पर भी कम नहीं होता?

क्या मैं मन हूँ? 

मन को परिभाषित करने की शायद ज़रूरत नहीं। क्योंकि मन वही है जिसे हम सबसे क़रीब से जानते हैं।

हर भावना, हर विचार, हर डर, हर उम्मीद — सब इसी में तो जन्म लेते हैं।

पर फिर भी…
क्या मन “मैं” है?

थोड़ा रुककर खुद से पूछिए।

जब आप “मैं” कहते हैं, क्या आप इस मन की और इशारा कर रहे होते हैं?

नहीं।

हम कहते हैं, मेरा मन”, ना की “मैं मन

और “मेरा” का मतलब साफ़ है: मन और मैं अलग हैं।

अगर हम खुद मन होते, तो क्या कभी मन पर लगाम लगाने की कोशिश करते?

ना जाने कितनी बार हमने अपने मन को देखा है, उसे संभालने, रोकने, समझाने की कोशिश की है।

जो चीज़ देखी जा सकती है, उसे देखने वाला वही कैसे हो सकता है?

हाँ, ये सच है कि “मैं” के ज़्यादातर काम मन की स्थिति पर ही टिके होते हैं।

तो कोई कह सकता है:
“असल मालिक तो मन है, ‘मैं’ नहीं।”

पर फिर भी, उस स्थिति में भी, “मन” और “मैं” अलग ही रहते हैं

तो फिर…
कौन है ये जो मन को देखता है?

कौन है ये जो मन की उथल-पुथल के बीच भी चुपचाप गवाह बना रहता है?

क्या “मैं” मन से भी पार है?

क्या मैं बुद्धि हूँ?

मन तो फिर भी एक ऐसी चीज़ है जो अक्सर हमारे क़ाबू में नहीं रहता। वो बिना पूछे ही ख्वाहिशें, डर, कल्पनाएँ पैदा करता रहता है।

लेकिन बुद्धि…
बुद्धि तो “अपनी” लगती है।

मीठा देखते ही मन खिंच जाता है उसकी तरफ़। पर बुद्धि ही है जो मन को रोकती है, तर्क देती है, कहती है:
“मत खाओ, ये नुक़सान करेगा।”

और जब हम कोई फ़ैसला लेते हैं, हम कहते हैं: “ये मैंने किया।”
क्योंकि हमें लगता है कि बुद्धि = मैं

लेकिन रुकिए…
क्या सच में हमें ऐसा लगता है?

क्या हमने कभी कहा है “मैं बुद्धि हूँ”?
नहीं।
हम हमेशा कहते हैं: “मेरी बुद्धि” या “मेरा दिमाग़”

“मेरा” का मतलब साफ़ है: बुद्धि भी मेरी संपत्ति है, मैं नहीं।

हम किसी को बुद्धिमान कहते हैं। “मान” यानी धारण करने वाला।

मतलब “मैं” बुद्धि को धारण करता हूँ, पर “मैं” = बुद्धि नहीं।

सोचिए…
हम बुद्धि को हमेशा एक हथियार की तरह देखते हैं।

ऐसा हथियार जिसे हम और तेज़ कर सकते हैं। जिसे हम आक्रमण के लिए भी, बचाव के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

पर क्या हम कभी कहते हैं कि हम ही वो हथियार हैं?

नहीं।

तो फिर कौन है ये जो दावा करता है इस हथियार को चलाने का?

कौन है ये ‘मैं’ जो बुद्धि का भी मालिक बना बैठा है?

क्या मैं चेतना हूँ? 

हम मानते हैं कि चेतना ही हमारे अस्तित्व की नींव है। चेतना ही वो प्रकाश है जिससे जीवन को देखा और अनुभव किया जाता है।

शरीर, मन, बुद्धि
सबको देखने वाली भी चेतना ही है।

अगर चेतना न हो, तो अस्तित्व का कोई मतलब ही नहीं।

तो क्या इसका मतलब है कि जब हम “मैं” कहते हैं, तो हम इसी चेतना की ओर इशारा करते हैं?

नहीं।

सच तो ये है, हम चेतना को भी एक साधन की तरह ही लेते हैं।

एक ऐसा साधन जो “मैं” के बने रहने के लिए बेहद ज़रूरी है।

यही वजह है कि इस “मैं” का सबसे बड़ा डर यही है:
“कहीं मेरी चेतना ही न खो जाए।”

लेकिन ज़रा गौर कीजिए — 
क्या मेरी चेतना कहने में वही भाव नहीं छुपा जो फैले सब में छुपा था? चेतना मेरी है, पर चेतना मैं नहीं।

हमें लगता है, चेतना तो हमारे हाथ में एक टॉर्च की तरह है, जो रोशनी डालती है, देखने में मदद करती है।

पर जो टॉर्च थामे हुए है, जो उसे दिशा दे रहा है, जो उससे देख रहा है…

वो कौन है?

अगर चेतना भी “मैं” नहीं, तो कौन है ये “मैं” जो चेतना को भी सिर्फ़ साधन मानता है?

क्या “मैं” इन सब का योग है? 

हो सकता है कि अब तक हम सच को टुकड़ों में देख रहे थे।

हो सकता है “मैं” किसी कार की तरह हो।

जैसे पहिए, सीट, इंजन, इन सबको अलग-अलग देखकर कोई कार नहीं कहेगा, पर जब ये सब मिलते हैं तो कार बनती है।

क्या “मैं” भी ऐसा ही है?

क्या “मैं”, शरीर + मन + बुद्धि + चेतना है?

नहीं। कार का उद्धारण यहाँ ठीक नहीं।

क्यों? क्योंकि पहिया कार का हिस्सा है।

लेकिन शरीर, मन, बुद्धि, चेतना…
ये “मैं” के हिस्से नहीं हैं। इन सबको “मैं” अपनी संपत्ति मानता है।

और एक बात तो साफ़ है:
हिस्सों को जोड़कर पूरा बन सकता है,
लेकिन संपत्ति को जोड़कर मालिक नहीं।

कार के हिस्से जोड़ोगे, तो कार बनेगी।

लेकिन पाँच घरों को जोड़कर “घर का मालिक” नहीं बनता।

उसी तरह,
शरीर, मन, बुद्धि और चेतना
इनका योग “मैं” नहीं हो सकता।

तो “मैं” है कहाँ?

अब यहाँ हम फँस गए हैं। क्योंकि हमने हर वो जगह देख ली जहाँ “मैं” होने की संभावना थी।

पर हमने देखा कि “मैं” न तो शरीर है, न मन, न बुद्धि, न चेतना।

और इन सबको मिलाकर भी “मैं” नहीं बनता।

तो फिर ये “मैं” आख़िरी है कहाँ?

ये सवाल कोई और नहीं बता सकता। ये सवाल हमें खुद से ही पूछना होगा

आखिर हम ही तो हैं जिसके हर वाक्य, विचार और भाव में “मैं” है।

हमारे अलावा कौन बताएगा कि ये “मैं” आख़िर है क्या?

ज़रा रुकिए…
ध्यान से देखिए इस “मैं” को।

क्या है ये जिसे लेकर हम इतने चिंतित रहते हैं? क्या है ये जिस पर हम गर्व करते हैं, जिसे लेकर हम लज्जा से भरे रहते हैं?

अगर हो सके तो आगे बढ़ने से पहले ख़ुद देखने की कोशिश करें

अभी, इसी वक्त “मैं” को देखिए।

अभी इसी वक्त देखिए, क्या आपके दिमाग़ में एक तस्वीर नहीं बन रही कि आप कहाँ बैठे हैं, क्या कर रहे हैं?

क्या दिमाग़ में एक कहानी नहीं चल रही?

“मैं ये कर रहा हूँ, फिर मुझे वो करना है, उसके बाद ये होगा।”

और जब ये लेख ख़त्म होगा, दिमाग़ इसमें भी एक नई लाइन जोड़ देगा:
“आज मैंने ये लेख पढ़ा।”

देखा आपने?

अभी, इसी क्षण भी, दिमाग़ लगातार इस अनुभव को “मेरी कहानी” में फिट करने की कोशिश कर रहा है।

जब आपने ऊपर की पंक्तियाँ पढ़ीं, क्या तुरंत कोई अंदरूनी आवाज़ नहीं उठी?

“हाँ, सही है, मैं भी ऐसा ही करता हूँ।”

या

“नहीं, ये बात मुझ पर लागू नहीं होती।”

ध्यान दीजिए — ये जो भीतर प्रतिक्रिया उठ रही है, ये जो आपको समझा रही है कि ये लेख आपके बारे में है या नहीं, वही है हमारी हर अनुभव को एक कहानी में बुनने की आदत

हर अनुभव, हर शब्द, हर संवेदना…
दिमाग़ उसे तुरंत मेरे बारे में जोड़ देता है।

और जैसे-जैसे ये जोड़ता जाता है, एक कहानी गढ़ी जाती है।

और इसी कहानी का मुख्य किरदार बन जाता है — “मैं”।

हाँ…
“मैं” एक किरदार है।

एक काल्पनिक किरदार, जिसके पास एक नाम भी है और एक छवि भी।

हाँ…
“मैं” सिर्फ़ एक विचार है।

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि ये विचार बाकी विचारों से अलग होकर विचारक की कुर्सी पर जा बैठा है।

कहानी या जीवन?

हम आम तौर पर सोचते हैं:
“ज़िंदगी = वास्तविक अनुभव।
कहानी = उन अनुभवों की व्याख्या।”

पर जैसा कि हमने देखा, हमारी ज़िंदगी खुद एक कहानी ही है।

हम कभी वास्तविक अनुभव को तो जीते ही नहीं।

ज़रा खुद से पूछिए:
क्या आपने भूख, दर्द, या मज़े जैसी संवेदनाओं को जैसा है वैसा देखा है?

या फिर कोई भी संवेदना आते ही उससे बचने या उसे और पाने की दौड़ शुरू हो जाती है?

क्या हम हर अनुभव को “मैं के तराज़ू” पर नहीं तौलते?

“ये मेरे लिए अच्छा है”
या
“ये मेरे लिए बुरा है”

और फिर उसी के हिसाब से प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है।

ठीक वैसे ही जैसे कोई मशीन बटन दबते ही प्रतिक्रिया देती है।

यही “मैं” है जो हमें आज में जीने नहीं देता। ये हमें बीते हुए कल कि याद और आने वाले कल की कल्पनाओं में जकड़े रखता है।

यही हमें यक़ीन दिला देता है कि जीवन जीने के लिए नहीं, बल्कि कुछ बनने के लिए है। सिर्फ़ कहानी का पात्र नहीं, बल्कि नायक बनने के लिए है।

यही कहानी सिर्फ़ कुछ लोगों को मेरा बनाती है, और बाकी सबको पराया

यही कहानी कहती है: “तुम ख़ुद प्रकृति नहीं हो, तुम तो उसके भोक्ता हो। उसे इस्तेमाल करो।”

और प्रकृति से यही अलगाव जन्म देता है एक हीन भावना। 

वो बेचैनी, जो हमें लगातार धकेलती है कुछ और बनने के लिए, कुछ और पाने के लिए, और फिर और… और… और।

और फिर ज़िंदगी बन जाती है कुछ और पाने कि बेतुकी दौड़

एक दौड़ जहां हम सब अकेले ही अपने-अपने “मैं” के साथ दोड़े जा रहे हैं।

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